सीता-लक्ष्मण संवाद

सीता चौपाई:
सुनहु देव रघुवीर कृपाला, यहि मृग की अति सुन्दर छाला।
मारहु नाथ इसे तुम जाई, कृपा सिन्धु सुन्दर रघुराई।।

सीता प्रोज: प्राणनाथ यह कितना सुन्दर मृग है। इसे पकड लीजिये न।

राम: प्रिये! यह हमारे पास ही तो विचर रहा है।

सीता: नहीं नहीं नाथ! इसे तो पकडकर ही लाईये।

राम: प्रिये तुम इसे पकडकर क्या करोगी!

सीता: स्वामी मैं इसे पालूंगी और अच्छे-अच्छे आभूषण पहिनाकर तथा हरी-हरी घास खिलाकर अपना मन बहलाऊंगी।

राम: और यदि हाथ न आये तो?

सीता: तो इसे मारकर मृगछाला ही लेते आईये।

राम: अच्छा तो मैं जाता हूँ। लक्ष्मण तुम सावधानी से रहना।

लक्ष्मण: जो आज्ञा भ्राता जी। (राम का प्रस्थान)

[मृग के साथ राम का दिखाई देना तथा दूर से आवाज का आना]

प्राउन्टर कहे: लक्ष्मण! हाय लक्ष्मण! मेरी साहयता के लिये आओ। भैया लक्ष्मण।

सीता: लक्ष्मण ! लक्ष्मण! सुन रहे हो यह आवाज कहाँ से आ रही है?

लक्ष्मण: हाँ माताजी! कोई मेरा नाम लेकर मुझे साहयता के लिये पुकार रहा है!

सीता: कोई कौन? यह तो तुम्हारे ही भाई की आवाज है और तुम्हें साहयता के लिये बुलाया है। जाओ जल्दी जाकर उनकी साहयता करो।

लक्ष्मण: माता जी! आप तो यों ही संदेह कर रही हैं।

सीता: नहीं-नहीं वे अवश्य विपत्ति में हैं, क्योंकि इस वन में राक्षसों की संख्या बहुत अधिक है।

लक्ष्मण: माता जी! मुझे भ्राता जी पर पूर्ण विश्वास है। भला राक्षस उनका बिगाड ही क्या सकते हैं।

सीता: लक्ष्मण! यदि तुम आपत्ति के समय भाई की साहयता न करोगे तो कब करोगे? क्या तुम्हारे इन शब्दों से स्वार्थ की भावना नहीं झलकती?

लक्ष्मण: माताजी! ऐसा न कहिये। अगर मैं यहाँ से चला गया तो फिर आपकी रक्षा कौन करेगा?

सीता: मुझे यहाँ क्या मौत खा रही है?

सीता गाना:
तू अभी जाके भाई की इमदाद कर, मौत मुझको यहाँ कोई खाती नहीं।
पास रहने की तेरी जरूरत नही, मैं यहाँ से कहीं भागी जाती नहीं।
हाय भाई ही भाई का दुश्मन बना, क्या करूं पार मेरी बसाती नहीं।
साथ आया था शायद इसी वास्ते, कि यहाँ तो ये मुख से बुलाती नहीं।
तेरी पहली सी आँखें नहीं अब रहीं, तेरी नियत नजर साफ आती नहीं।
तेरा होगा न पूरा इरादा कभी, तेरी सूरत मुझे अब सुहाती नहीं। तू अभी जाके…..

लक्ष्मण गाना:
मेरी माता तुम्हें आज क्या हो गया, किस किसम की ये बातें सुनाती मुझे।
आज मन में तुम्हारे ये क्या आ गया, बेगुनाह हाय दोष लगाती मुझे।
सब करा अरू धरा मिल गया खाक में, आप बदमाश कहकर बुलाती मुझे।
अच्छा माता तुम्हारा भी क्या दोष है, मेरी किस्मत ही धक्के खिलाती मुझे।
बेशरम बेरहम बेधरम बेहय्या, बेवफा बेनका तक कहाती मुझे। मेरी माता तुझे…..

लक्ष्मण: माता जी! आज न जाने आपको क्या हो गया है जो अकारण ही मुझ पर ऐसा दोष लगा रही हो। खैर आपको भी क्या दोष दूं। हमारी किस्मत ही यह सब खेल खिला रही है।

प्राउन्टर कहे: भैय्या लक्ष्मण तुरन्त आकर मेरी साहयता करो, लक्ष्मण! भैय्या लक्ष्मण आओ।

सीता: प्राणनाथ! आप किसको बुला रहे हो, जिसको आपने अपना भाई समझा था वह तो पूरा स्वार्थी है! प्राणनाथ! आप अपना जीवन अपने ही भाग्य पर छोड दीजिये किन्तु स्वार्थी भाई से कोई आशा न रखिये मैं एक अबला आपकी क्या साहयता कर सकती हूँ।

लक्ष्मण: माता जी! यह आप नहीं कह रही हैं, बल्कि आज होनी कि कालचक्र ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है। अच्छा माता जी, मैं जाता हूँ किन्तु इतनी कृपा करना कि [रेखा खींचना] इस रेखा का उल्लंघन न करना।

लक्ष्मण शेर:
इस रेखा का उल्लंघन कर, जो पर्ण कुटी में आएगा।
          है आन उसे लक्ष्मण की तत्काल भस्म हो जाएगा।।
हे पवन देव तुम साक्षी हो, हे पक्षी गणों गवाह तुमही।
           मेरी सेवा की नौका के, हे सूर्यदेव मल्लाह तुम्हीं।।
आज्ञा पालन करता हुँ बस इतना है संतोष मुझे।
           रघुराई अगर उलहाना दें, तुम बतलाना संतोष मुझे।।

यह संवाद पुस्तक “श्री रामलीला अभिनय” सम्पादक: श्री छम्मीलाल ढौंडियाल से लिया गया है.

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One Response to सीता-लक्ष्मण संवाद

  1. पिंगबैक: महारानी का हार | यह भी खूब रही

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