भरत कैकेई संवाद

हे माता तुम मुझे ये बताओ:

वो सुकुमारी सीता माता, वन में क्यों कर रहती होंगी
कैसे वर्षा या कडी धूप, सर पर अपने सहती होंगी
वन में तपती बालू में चल, अत्यन्त विकल होती होंगी
रजनी में सूखे पत्तों पर, या कांटों पर सोती होंगी
वन में श्री राम समर्थ भाई, सौमित्र लखन सा भ्राता है
जिस घर में कुबडी सी दासी हो, और कैकेई जैसी माता हो
जब इतने पर भी वज्र गिरा, और छोडे प्राण पिताजी ने
क्या यही देखने को था, ना जीवन ना जीवन मुझ दुर्भागी ने
शत्रुघ्न किनारे सरयू के, तुम मुझको भी पहुँचा देना
हो जभी पिता का दाहक्रम, मेरी भी चिता जला देना

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